रांची। झारखंड के विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के लिए बुरी खबर है। अब वे शिक्षण के साथ-साथ राजनीति नहीं कर सकेंगे। सरकार के इस निर्णय से ऐसे शिक्षकों को बड़ा झटका लगा है, जो शिक्षण और राजनीति साथ-साथ करते रहे हैं। विश्वविद्यालय शिक्षक भी एकमात्र ऐसा वर्ग है, जो अपनी नौकरी के साथ-साथ राजनीति भी करते रहे हैं। कई शिक्षक तो नौकरी में रहते हुए विधायक, मंत्री और स्पीकर तक बन चुके हैं। ऐसे शिक्षक लीयन से वापस लौटने के बाद फिर से शिक्षण से जुड़ गये।
झारखंड में उच्च शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रित और जवाबदेह बनाने की दिशा में झारखंड विश्वविद्यालय विधेयक 2026 लागू किया गया है। इस विधेयक के जरिए विश्वविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवा शर्तों को न केवल स्पष्ट किया गया है, बल्कि उन्हें पहले की तुलना में कहीं अधिक सख्त और बाध्यकारी बनाया गया है।
इस कानून का सबसे बड़ा असर शिक्षकों की भूमिका और उनकी कार्यशैली पर पड़ेगा। विधेयक के अनुसार, अब कोई भी शिक्षक या कर्मचारी बिना अनुमति किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं ले सकते। इसमें राजनीतिक दलों से जुड़ाव, आंदोलनों में भागीदारी और आर्थिक सहयोग तक शामिल है। किसी संगठन को राजनीतिक मानने का अंतिम अधिकार राज्य सरकार को दिया गया है। इससे विश्वविद्यालय परिसरों में लंबे समय से सक्रिय राजनीतिक हस्तक्षेप पर प्रभावी नियंत्रण की कोशिश की गई है। शर्तों का उल्लंघन करने पर नौकरी तक जा सकती है।
शिक्षक नेताओं के अनुसार इससे शिक्षकों की स्वतंत्रता सीमित हो जाएगी। विवि केवल शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक विमर्श के भी मंच होते हैं।
गाली-गलौज, दुर्व्यवहार, वित्तीय गबन, आपराधिक मामलों में सजा और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को सेवा समाप्ति का आधार बनाया गया है। दोष सिद्ध हुआ तो कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
निजी कोचिंग और ट्यूशन को लेकर भी सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। किसी भी शिक्षक के लिए कोचिंग संस्थान चलाना, उससे जुड़ना या व्यावसायिक शैक्षणिक गतिविधि में भाग लेना पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। झारखंड के हजारों अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। राज्य में 10 मई 2026 को आयोजित होने वाली B.Ed, M.Ed और B.P.Ed संयुक्त प्रवेश प्रतियोगिता परीक्षा को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। Jharkhand Combined Entrance Competitive Examination Board (JCECEB) ने अपरिहार्य कारणों का हवाला देते हुए यह निर्णय लिया है। आधिकारिक नोटिस जारी, नई तिथि का इंतजार परीक्षा पर्षद ने इस संबंध में आधिकारिक सूचना जारी कर दी है। पहले यह परीक्षा राज्य के विभिन्न केंद्रों पर 10 मई (रविवार) को आयोजित होने वाली थी, लेकिन अब इसे अगले आदेश तक टाल दिया गया है। पर्षद ने स्पष्ट किया है कि नई परीक्षा तिथि जल्द घोषित की जाएगी और इसकी जानकारी आधिकारिक वेबसाइट व समाचार पत्रों के माध्यम से दी जाएगी। अभ्यर्थियों की तैयारी पर पड़ा असर परीक्षा स्थगित होने से छात्रों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। कई अभ्यर्थी लंबे समय से इस परीक्षा की तैयारी कर रहे थे और अंतिम चरण में पहुंच चुके थे। अचानक लिए गए इस फैसले से उनकी योजना प्रभावित हुई है। हालांकि कुछ छात्र इसे अतिरिक्त तैयारी के अवसर के रूप में भी देख रहे हैं। अभ्यर्थी उमेश रंजन ने कहा कि परीक्षा टलने से निराशा जरूर हुई है, लेकिन अगर यह निर्णय किसी जरूरी कारण से लिया गया है तो उम्मीद है कि नई तिथि जल्द घोषित होगी। वहीं दिनेश प्रसाद ने कहा कि इससे उनकी रणनीति पर असर पड़ा है, लेकिन अब उन्हें अपनी तैयारी और बेहतर करने का समय मिल गया है। पर्षद की सलाह: अफवाहों से बचें पर्षद ने सभी अभ्यर्थियों से अपील की है कि वे किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें। छात्रों को नियमित रूप से JCECEB की वेबसाइट चेक करने की सलाह दी गई है, ताकि नई तिथि से जुड़ी जानकारी समय पर मिल सके। पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं गौरतलब है कि वर्ष 2025 में भी झारखंड में एक प्रवेश परीक्षा का परिणाम रद्द होने के कारण छात्रों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था। ऐसे में इस बार परीक्षा स्थगन के फैसले के बाद अभ्यर्थी अधिक सतर्क हैं और जल्द नई तिथि घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
रांची। झारखंड में इन दिनों मौसम ने अचानक करवट ले ली है। लगातार हो रही बारिश के कारण राज्य के अधिकांश जिलों में तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। India Meteorological Department (मौसम विभाग) ने 6 से 10 मई तक राज्य में बादल छाए रहने, हल्की से मध्यम बारिश और वज्रपात (बिजली गिरने) की संभावना जताई है। इसके मद्देनजर येलो अलर्ट भी जारी किया गया है। तापमान में आई गिरावट, लोगों को राहत बारिश के चलते गर्मी से काफी राहत मिली है। Ranchi में पिछले 24 घंटों के दौरान अधिकतम तापमान करीब 5 डिग्री गिरकर 29.4 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया। वहीं Medininagar में तापमान में 5.6 डिग्री की गिरावट दर्ज की गई और अधिकतम तापमान 34 डिग्री सेल्सियस रहा। अन्य जिलों में भी तापमान सामान्य से नीचे दर्ज किया गया है। 6 से 10 मई तक कैसा रहेगा मौसम? मौसम विभाग के अनुसार इस अवधि में राज्य के कई हिस्सों में आंशिक से घने बादल छाए रहेंगे। कुछ क्षेत्रों में हल्की बारिश हो सकती है, जबकि वज्रपात की भी आशंका है। हवा की रफ्तार 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे तक रहने का अनुमान है। दिन के तापमान में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन मौसम पूरी तरह साफ होने में समय लगेगा। तेनुघाट में सबसे ज्यादा बारिश पिछले 24 घंटों में तेनुघाट में सबसे अधिक 82.2 मिमी बारिश दर्ज की गई। इसके अलावा कांके में 50.2 मिमी और पश्चिमी सिंहभूम में लगभग 8 मिमी वर्षा हुई है। अन्य जिलों का तापमान जमशेदपुर में 34.2 डिग्री, बोकारो में 32.5 डिग्री, चाईबासा में 32.4 डिग्री, कोडरमा में 31.4 डिग्री और गुमला में 30.9 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया। वहीं लातेहार और लोहरदगा में तापमान 28 डिग्री के आसपास रहा।
रांची। झारखंड स्टेट आरोग्य सोसायटी (स्वास्थ्य विभाग) ने पेंशनरों, बोर्ड-निगम और विश्वविद्यालय कर्मियों के लिए स्वास्थ्य बीमा पंजीकरण का पोर्टल खोल दिया है। इस योजना के तहत लाभुक 31 मई तक ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। यह पंजीकरण मई 2026 से अप्रैल 2027 के बीमा वर्ष के लिए किया जा रहा है। इस दौरान चयनित लाभुकों को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलेगा। आवेदन के बाद सत्यापन पंजीकरण के बाद सभी आवेदनों की जांच संबंधित डीडीओ या सत्यापन अधिकारी द्वारा की जाएगी। सत्यापन पूरा होने के बाद ही लाभुक ऑनलाइन माध्यम से प्रीमियम जमा कर पाएंगे। इस योजना के लिए 6000 रुपये का एकमुश्त प्रीमियम तय किया गया है। इसे निर्धारित समय सीमा के भीतर जमा करना अनिवार्य होगा, तभी योजना का लाभ मिलेगा। जो पेंशनर पिछले बीमा वर्ष में योजना से जुड़े थे, लेकिन किसी कारणवश प्रीमियम जमा नहीं कर पाए, वे भी इस बार अपना नवीनीकरण करा सकते हैं। टोल फ्री नंबर जारी पंजीकरण या किसी भी समस्या के समाधान के लिए टोल फ्री नंबर 1800-3455-027 जारी किया गया है, जहां से जानकारी और सहायता ली जा सकती है। इस बीमा वर्ष के लिए योजना के संचालन की जिम्मेदारी टाटा एआईजी कंपनी को दी गई है।