लॉर्ड्स, एजेंसियां। भारत और इंग्लैंड के बीच खेली गई तीन मैचों की वनडे सीरीज का निर्णायक मुकाबला इंग्लैंड ने 27 रन से जीतकर 2-1 से अपने नाम कर लिया। लॉर्ड्स में खेले गए इस हाई-स्कोरिंग मुकाबले में रोहित शर्मा की 138 रन की शानदार पारी और विराट कोहली (74) तथा शुभमन गिल (77) के अर्धशतक भी भारत को जीत नहीं दिला सके। इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 387/3 का विशाल स्कोर बनाया, जिसके जवाब में भारत 360/7 ही बना सका।
टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी इंग्लैंड की शुरुआत शानदार रही। बेन डकेट ने करियर की सर्वश्रेष्ठ 141 रन की पारी खेली, जबकि जैकब बेथेल ने 91 रन बनाए। दोनों ने पहले विकेट के लिए 192 रन जोड़कर भारत के गेंदबाजों पर दबाव बना दिया। अंत में जो रूट (नाबाद 74) और जोस बटलर (13 गेंदों में नाबाद 41) ने तेज रन बटोरकर टीम को 387 रन तक पहुंचाया।
388 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत को रोहित शर्मा और शुभमन गिल ने 147 रन की शानदार शुरुआत दिलाई। रोहित ने 110 गेंदों पर 138 रन बनाए, जिसमें 17 चौके और 5 छक्के शामिल रहे। गिल ने 77 और विराट कोहली ने 74 रन की उपयोगी पारी खेली, लेकिन नियमित अंतराल पर विकेट गिरने से भारत लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका।
इंग्लैंड की ओर से सैम करन ने शानदार गेंदबाजी करते हुए 4 विकेट झटके। उन्होंने मैच के अहम मोड़ पर विराट कोहली, केएल राहुल समेत कई महत्वपूर्ण बल्लेबाजों को आउट कर भारत की जीत की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
इस जीत के साथ इंग्लैंड ने तीन मैचों की वनडे सीरीज 2-1 से अपने नाम कर ली। भारत के लिए रोहित शर्मा की यादगार पारी हार के कारण फीकी पड़ गई, जबकि इंग्लैंड ने घरेलू मैदान पर दमदार प्रदर्शन करते हुए शीर्ष रैंकिंग वाली भारतीय टीम के खिलाफ महत्वपूर्ण सीरीज जीत दर्ज की।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। 23 जुलाई से ग्लासगो में शुरू होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 से पहले भारतीय एथलेटिक्स दल ने अपनी तैयारियां अंतिम चरण में पहुंचा दी हैं। भारतीय दल में कई अनुभवी खिलाड़ियों के साथ युवा प्रतिभाओं को भी जगह मिली है। इनमें 19 वर्षीय धाविका नीरू पाठक पर विशेष नजर रहेगी, जो पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। 400 मीटर और मिक्स्ड रिले में उतरेंगी नीरू पाठक नीरू पाठक को महिला 400 मीटर और मिक्स्ड 4×400 मीटर रिले के लिए भारतीय टीम में शामिल किया गया है। हाल के महीनों में उनके लगातार बेहतर प्रदर्शन और राष्ट्रीय स्तर पर शानदार टाइमिंग के कारण उनसे पदक की उम्मीदें बढ़ गई हैं। युवा एथलीटों पर रहेगा फोकस भारतीय एथलेटिक्स महासंघ ने इस बार अनुभवी खिलाड़ियों के साथ कई युवा चेहरों को भी मौका दिया है। नीरू पाठक जैसे एथलीटों से भविष्य के बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के लिए मजबूत आधार तैयार करने की उम्मीद जताई जा रही है। एशियाई स्तर पर भी दिखा चुकी हैं दम नीरू पाठक हाल ही में अंडर-20 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2026 में महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा में कांस्य पदक जीत चुकी हैं। उनके इसी प्रदर्शन के आधार पर उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स की टीम में जगह मिली। 23 जुलाई से शुरू होंगे मुकाबले कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का आयोजन 23 जुलाई से 2 अगस्त तक ग्लासगो में होगा। भारतीय एथलेटिक्स दल को इस बार ट्रैक और फील्ड स्पर्धाओं में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है, जबकि नीरू पाठक समेत कई युवा खिलाड़ी पहली बार इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में अपनी चुनौती पेश करेंगे।
लंदन: फीफा विश्व कप 2026 के समापन के तुरंत बाद फुटबॉल जगत से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। इंग्लैंड के महान फुटबॉलर, राष्ट्रीय टीम के पूर्व कप्तान और पूर्व मुख्य कोच केविन कीगन का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे और पिछले महीने ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी बीमारी की जानकारी दी थी। उनके निधन की पुष्टि उनके पूर्व क्लब न्यूकैसल यूनाइटेड ने आधिकारिक रूप से की। क्लब ने श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें अपने इतिहास की सबसे प्रतिष्ठित, प्रभावशाली और सबसे प्रिय हस्तियों में से एक बताया। यूरोपीय फुटबॉल के महान सितारों में थी गिनती 1970 के दशक में केविन कीगन दुनिया के सबसे चमकदार फुटबॉल सितारों में शामिल थे। उनकी तेज रफ्तार, गोल करने की शानदार क्षमता और मैदान पर अथक मेहनत ने उन्हें विश्व फुटबॉल में एक अलग पहचान दिलाई। वह इंग्लैंड के उन चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल थे जिन्हें दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित व्यक्तिगत फुटबॉल सम्मान बैलन डी'ओर जीतने का गौरव हासिल हुआ। लगातार दो बार जीता बैलन डी'ओर कीगन ने अपने करियर की शुरुआत इंग्लैंड में की, लेकिन बाद में यूरोप की बड़ी लीग में खेलने का साहसिक फैसला लिया। 1977 में लिवरपूल के साथ यूरोपीय कप जीतने के बाद वह जर्मनी के क्लब हैम्बर्ग एसवी से जुड़ गए। हैम्बर्ग के साथ उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए: 1978 में बैलन डी'ओर जीता 1979 में लगातार दूसरी बार बैलन डी'ओर अपने नाम किया 1979 में हैम्बर्ग को बुंडेसलीगा चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाई हैम्बर्ग क्लब ने भी उन्हें अपने इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में शामिल बताया। इंग्लैंड के लिए शानदार अंतरराष्ट्रीय करियर केविन कीगन ने इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम के लिए 63 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले और 21 गोल किए। उन्होंने 1982 फीफा विश्व कप में भी इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व किया और टीम के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ियों में गिने गए। कोच के रूप में भी छोड़ी अमिट छाप खिलाड़ी के रूप में सफलता हासिल करने के बाद कीगन ने कोचिंग में भी शानदार योगदान दिया। 1992 से 2008 तक विभिन्न क्लबों और टीमों को कोचिंग दी। न्यूकैसल यूनाइटेड को 1995-96 प्रीमियर लीग खिताब के बेहद करीब पहुंचाया। 1999 से 2000 तक इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम के मुख्य कोच रहे। हालांकि यूरो 2000 में इंग्लैंड पहले दौर में ही बाहर हो गया और 2002 विश्व कप क्वालीफायर में जर्मनी से हार के बाद उन्होंने मुख्य कोच पद से इस्तीफा दे दिया। फुटबॉल जगत में शोक की लहर केविन कीगन का निधन फुटबॉल जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। खिलाड़ी, पूर्व साथी, क्लब और दुनिया भर के फुटबॉल प्रशंसक उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। मैदान पर उनका योगदान और खेल के प्रति उनका समर्पण हमेशा याद रखा जाएगा।
रांची। रांची के खेलगांव स्थित विभिन्न मैदानों में आयोजित 65वीं राज्य स्तरीय सुब्रतो मुखर्जी फुटबॉल प्रतियोगिता के तीसरे दिन कोल्हान और संथाल प्रमंडल की टीमों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए नॉकआउट चरण में अपनी मजबूत दावेदारी पेश की। झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद के तत्वावधान में आयोजित इस प्रतियोगिता के नॉकआउट मुकाबले रविवार से शुरू हुए, जहां खिलाड़ियों ने अनुशासन, बेहतर तालमेल और उत्कृष्ट खेल कौशल का परिचय दिया। मुकाबले खेलगांव प्रैक्टिस ग्राउंड, बीआईटी ग्राउंड-1, बीआईटी ग्राउंड-2 और जैप-1 डोरंडा मैदान में खेले गए। अंडर-17 बालिका वर्ग और अंडर-17 बालक वर्ग अंडर-17 बालिका वर्ग में कोल्हान प्रमंडल ने पलामू प्रमंडल को 10-0 के बड़े अंतर से हराकर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। वहीं दूसरे मुकाबले में उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल ने संथाल प्रमंडल को 1-0 से शिकस्त दी। अंडर-17 बालक वर्ग में संथाल प्रमंडल ने पलामू प्रमंडल को 3-0 से हराया, जबकि कोल्हान प्रमंडल ने उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल को 6-1 से पराजित कर नॉकआउट चरण में प्रभावशाली प्रदर्शन किया। दिन का सबसे बड़ा मुकाबला अंडर-15 बालक वर्ग में देखने को मिला, जहां संथाल प्रमंडल ने पलामू प्रमंडल को 12-0 से करारी शिकस्त दी। यह प्रतियोगिता के तीसरे दिन की सबसे बड़ी जीत रही। इस शानदार प्रदर्शन ने खिलाड़ियों के आत्मविश्वास के साथ दर्शकों और टीम प्रबंधन का उत्साह भी बढ़ाया। धीरसेन सोरेंग ने कहा झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद के धीरसेन सोरेंग ने कहा कि सुब्रतो मुखर्जी फुटबॉल प्रतियोगिता का उद्देश्य स्कूली खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए बेहतर मंच उपलब्ध कराना है। उन्होंने बताया कि सभी टीमों ने खेल भावना और अनुशासन का परिचय दिया है तथा नॉकआउट चरण के मुकाबलों में प्रतिस्पर्धा और अधिक रोमांचक होने की उम्मीद है। प्रतियोगिता के चौथे दिन अपने-अपने समूहों में शीर्ष स्थान हासिल करने वाली प्रमंडलीय विजेता टीमों के बीच नॉकआउट मुकाबले खेले जाएंगे। इन मुकाबलों के विजेता विभिन्न वर्गों के सेमीफाइनल में प्रवेश करेंगे। प्रतियोगिता का भव्य समापन और फाइनल मुकाबले 21 जुलाई को आयोजित होंगे, जहां विभिन्न वर्गों में राज्य के नए चैंपियनों का फैसला किया जाएगा।