मौसम विभाग ने जारी किया ऑरेंज अलर्ट
Jharkhand में मौसम ने अचानक करवट ले ली है। राज्य के कई हिस्सों में बारिश और तेज हवाओं से लोगों को गर्मी से राहत मिली है। वहीं मौसम विभाग ने 9 और 10 मई को तेज आंधी, बारिश और वज्रपात की आशंका को देखते हुए कई जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है।
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक साइक्लोनिक सर्कुलेशन के असर से 13 मई तक राज्यभर में मौसम का मिजाज बदला रह सकता है।
8 मई को झारखंड के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों को छोड़कर बाकी इलाकों में गरज के साथ बारिश और तेज हवाएं चलने की संभावना है। इस दौरान हवा की रफ्तार 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। इसे देखते हुए मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी किया है।
मौसम विभाग के अनुसार 9 और 10 मई को Ranchi, Dhanbad, Bokaro, Ramgarh, Khunti, Lohardaga और Gumla समेत उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी जिलों में तेज मौसम का ज्यादा असर देखने को मिल सकता है।
इन इलाकों में 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवा चल सकती है। साथ ही वज्रपात और बारिश की भी संभावना जताई गई है। इसके लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है।
वहीं राज्य के बाकी हिस्सों में भी तेज हवा और बारिश को लेकर येलो अलर्ट जारी किया गया है।
मौसम विभाग का कहना है कि 13 मई तक राज्य में बादल छाए रह सकते हैं। दिन में उमस और गर्मी बनी रहेगी, जबकि दोपहर बाद कई इलाकों में गरज के साथ बारिश हो सकती है।
गुरुवार को कई जिलों में मौसम बदला हुआ नजर आया। Ranchi में दिनभर तेज धूप के बाद शाम में बारिश हुई। वहीं East Singhbhum के दारीसाई इलाके में सबसे ज्यादा 14 मिमी बारिश दर्ज की गई।
तापमान की बात करें तो रांची का अधिकतम तापमान 32.6 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया, जबकि Medininagar सबसे गर्म रहा, जहां अधिकतम तापमान 37.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। झारखंड सरकार ने राज्य प्रशासनिक सेवा के 31 अफसरों को संयुक्त सचिव पद में प्रोन्नति दी है। इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई है। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार, कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग ने राज्य प्रशासनिक सेवा के 31 अधिकारियों को संयुक्त सचिव (Joint Secretary) के पद पर प्रमोट कर दिया है। विभागीय प्रोन्नति समिति (DPC) की अनुशंसा के बाद जारी इस आदेश के तहत, इन अधिकारियों को अब पे-मैट्रिक्स लेवल 13 का लाभ मिलेगा। यह निर्णय राज्य में प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने और लंबे समय से लंबित प्रोन्नति की मांगों को पूरा करने के उद्देश्य से लिया गया है। भरे जा सकेंगे रिक्त पद इस फेरबदल से विभिन्न सरकारी विभागों में रिक्त पड़े वरिष्ठ पदों को भरने में मदद मिलेगी, जिससे विकास कार्यों में तेजी आने की उम्मीद है। प्रमोशन पाने वाले अधिकारियों की सूची में राज्य के विभिन्न जिलों और विभागों में कार्यरत अनुभवी अफसर शामिल हैं। इन अफसरों को मिला प्रमोशन 1. चंद्रभूषण सिंह, बंदोबस्त पदा. दुमका 2. रामवृक्ष महतो, संयुक्त सचिव, राजस्व, निंबधन व भूमि सुधार विभाग 3. मुमताज अली अहमद, उप निदेशक, जनजातीय कल्याण एवं कार्यक्रम आदिवासी कल्याण आयुक्त 4. अरविंद कुमार लाल, उप सचिव जेएसएससी 5. राज महेश्वरम, अपर समाहर्ता, गढ़वा 6. हरिवंश पंडित, सचिव प्रादेशिक परिवहन प्राधिकार, दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल, रांची 7. सीमा सिंह, उप निदेशक, रिनपास, रांची 8. अनवर हुसैन, उप सचिव, नगर विकास एवं आवास विभाग 9. अनंत कुमार, स्वास्थ्य सचिव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग 10. ज्योति कुमारी झा, उच सचिव वित्त विभाग 11. संदीप दुबे, आप्त सचिव ग्रामीण विकास मंत्री 12. स्व. विनय कुमार मिश्र, तत्कालीन एडीसी, पूर्वी सिंहभूम 13. संतोष कुमार गर्ग, निदेशक, एनइपी 14. कमलेश्वर नारायण, अपर नगर आयुक्त, धनबाद नगर निगम 15. विजय कुमार, सचिव प्रादेशिक परिवहन प्राधिकार, उत्तरी छोटानागपुर, हजारीबाग 16. स्व. दीपू कुमार, तत्कालीन उप सचिव राजस्व निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग 17. संजय पांडेय, उप सचिव गृह कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग 18. राजीव कुमार, अपर समाहर्ता दुमका 19. धीरेंद्र कुमार सिंह, उप निदेशक कल्याण एवं अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग विभाग 20. राकेश कुमार, संयुक्त सचिव, गृह कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग 21. राजेश्वर नाथ आलोक, अपर जिला दंडाधिकारी, रांची 22. संजीव कुमार, उप निदेशक कल्याण, रांची प्रमंडल 23. जियाउल अंसारी, विशिष्ट अनुभाजन पदा. धनबाद 24. दिनेश कुमार रंजन, क्षेत्रीय उप निदेशक, जियाडा, आदित्यपुर 25. पंकज कुमार साव, अपर निदेशक, उद्योग निदेशालय 26. प्रणव कुमार पाल, संयुक्त निदेशक उद्योग विभाग 27. विनय मनीष आर लकड़ा, सचिव झारखंड राज्य आवास बोर्ड रांची 28. योगेंद्र प्रसाद, प्रतीक्षारत 29. अजय सिंह बड़ाइक, जिला भू-अर्जन पदा. पाकुड़ 30. प्रेमलता मुर्मू, अपर समाहर्ता गोड्डा 31. परमेश्वर मुंडा, अपर समाहर्ता खूंटी प्रोन्नति पाने वाले प्रमुख अधिकारियों में रौशन कुमार शाह, जो पथ निर्माण विभाग में उप सचिव हैं, संजय कुमार दास, परियोजना निदेशक आईटीडीए साहिबगंज, कुमारी गीतांजलि, अरविंद लाल परीक्षा नियंत्रक जेएसएससी, अपर समाहर्ता रामगढ़, मनीष कुमार, सचिव क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकार पलामू प्रमंडल, विजय कुमार सचिव क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकार हजारीबाग और ज्ञानेन्द्र, अपर समाहर्ता सिमडेगा शामिल हैं। इसके अलावा महेंद्र कुमार, उप सचिव कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग, उषा मुंडू, उप सचिव ग्रामीण विकास विभाग, प्रेम कुमार तिवारी, महाप्रबंधक झारखंड मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, संतोष सिंह, अपर समाहर्ता हजारीबाग और शहंशाह अली खान, उप सचिव ग्रामीण विकास विभाग को भी प्रोन्नति मिली है। अन्य अधिकारियों को भी मिला लाभ सूची में विभूति मंडल, क्षेत्रीय विकास पदाधिकारी संथाल परगना प्रमंडल, सुमन पाठक, मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी सरायकेला-खरसावां, विद्या भूषण कुमार, निदेशक लेखा प्रशासन एवं स्वनियोजन गुमला तथा गौतम कुमार भगत, अपर समाहर्ता साहिबगंज के नाम भी शामिल हैं। इनके अलावा 51 अन्य राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारियों को भी पदोन्नति का लाभ मिला है। सरकार का मानना है कि अनुभवी अधिकारियों को उच्च जिम्मेदारी देने से प्रशासनिक कार्यों में तेजी आएगी और विभागीय समन्वय बेहतर होगा। प्रोन्नति के बाद अधिकारियों की जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी और उनसे नीति निर्माण तथा योजनाओं के क्रियान्वयन में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की अपेक्षा की जा रही है।
रांची। रांची जिले के निजी स्कूलों के लिए जिला प्रशासन की ओर से महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। यह बैठक शनिवार को रांची विश्वविद्यालय स्थित आर्यभट्ट सभागार में आयोजित होगी। बैठक की अध्यक्षता रांची उपायुक्त Manjunath Bhajantri करेंगे। इसमें जिले के सभी CBSE, ICSE, JAC समेत अन्य बोर्डों से संबद्ध निजी विद्यालयों के प्राचार्य या उनके अधिकृत प्रतिनिधियों को शामिल होना अनिवार्य किया गया है। जिला प्रशासन के अनुसार बैठक सुबह 11:30 बजे शुरू होगी, जबकि पंजीकरण प्रक्रिया सुबह 11:00 बजे से आरंभ कर दी जाएगी। सभी प्रतिनिधियों को समय पर पहुंचने का निर्देश दिया गया है ताकि बैठक निर्धारित समय पर शुरू हो सके। RTE से जुड़े मुद्दों पर रहेगा फोकस बैठक में मुख्य रूप से शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाएगी। इसमें निजी स्कूलों में आरटीई के तहत दाखिला प्रक्रिया, सीट आवंटन, नियमों के अनुपालन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। जिला प्रशासन की ओर से स्कूल प्रबंधन को जरूरी दिशा-निर्देश भी दिए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में आरटीई के तहत नामांकन और सीट आवंटन को लेकर कई स्तरों पर सवाल उठे थे। ऐसे में यह बैठक शिक्षा व्यवस्था में समन्वय और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रशासन ने जारी किया सख्त निर्देश जिला प्रशासन ने साफ कहा है कि यह केवल औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अहम विषयों पर विचार-विमर्श का मंच है। इसलिए सभी निजी विद्यालयों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति जरूरी है। प्रशासन ने स्कूल प्रबंधन से अपील की है कि वे समय से पहले पहुंचकर पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करें और बैठक को सफल बनाने में सहयोग दें।
रांची। झारखंड में शिक्षक नियुक्ति को लेकर पारा शिक्षकों का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। अब तक शिक्षक बहाली में पारा शिक्षकों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित रहती थीं, लेकिन बीते गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सहायक शिक्षक और सहायक आचार्य के कुल रिक्त पदों में से 50 प्रतिशत पद पारा शिक्षकों के लिए आरक्षित किए जाएं। कोर्ट ने सरकार को चार सप्ताह के भीतर इस संबंध में अधिसूचना जारी करने का आदेश भी दिया है। इस फैसले के बाद पारा शिक्षकों में उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आरक्षित सीटें पूरी तरह भर पाएंगी या फिर पहले की तरह कई पद खाली रह जाएंगे। योग्यता के कारण पीछे रह जाते हैं पारा शिक्षक बता दें कि पारा शिक्षकों की सीधी नियुक्ति नहीं होने की सबसे बड़ी वजह निर्धारित अर्हता हैं। पारा शिक्षकों को नियमित शिक्षक बनने के बीएड उत्तीर्ण होना जरूरी है। इसके अलावा अधिकतर पारा शिक्षक JTET या CTET उत्तीर्ण भी नहीं हैं। ऐसे में आरक्षण मिलने के बावजूद वे नियुक्ति प्रक्रिया में पीछे रह जाते हैं। अब बताते है पारा शिक्षकों की नियुक्ति कैसे होती है ? और राज्य में कुल कितने शिक्षक है? झारखंड में वर्तमान समय में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों को मिलाकर कुल 66,379 पारा शिक्षक कार्यरत हैं। इनकी नियुक्ति ग्राम सभा के माध्यम से की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को चलाने में इन शिक्षकों की अहम भूमिका रही है। हालांकि इन्हें नियमित शिक्षकों की तरह वेतन और सुविधाएं नहीं मिलतीं। 20 वर्षों से मानदेय बढ़ाने की मांग पारा शिक्षक पिछले करीब 20 वर्षों से अपने मानदेय और स्थायीकरण की मांग को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। कई बार राज्यव्यापी हड़ताल और प्रदर्शन भी हो चुके हैं। उनका कहना है कि लंबे समय से सेवा देने के बावजूद उन्हें नियमित शिक्षकों के बराबर सम्मान और वेतन नहीं मिल रहा है। अब राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने के साथ योग्य अभ्यर्थियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। यदि पर्याप्त संख्या में JTET, CTET और बीएड योग्य पारा शिक्षक उपलब्ध नहीं होते हैं, तो 50 प्रतिशत आरक्षित सीटों को पूरी तरह भरना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में सरकार को प्रशिक्षण और पात्रता से जुड़ी व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।