नई दिल्ली, एजेंसियां। देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी Maruti Suzuki अगले महीने अपनी लोकप्रिय कॉम्पैक्ट एसयूवी Brezza का फेसलिफ्ट मॉडल लॉन्च करने की तैयारी में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 Maruti Brezza फेसलिफ्ट को 23 जुलाई को भारतीय बाजार में पेश किया जा सकता है। वर्ष 2022 में लॉन्च हुई दूसरी पीढ़ी की Brezza को पहली बार बड़ा मिड-लाइफ अपडेट मिलने जा रहा है। नई Brezza में डिजाइन के साथ-साथ इंजन, फीचर्स और तकनीक के स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
नई Brezza के डिजाइन में बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है, लेकिन इसमें रिवाइज्ड फ्रंट ग्रिल, नए डिजाइन के बंपर, स्टाइलिश एलॉय व्हील्स और कुछ नए एक्सटीरियर कलर विकल्प दिए जा सकते हैं। कंपनी मौजूदा मॉडल की लोकप्रियता को देखते हुए इसके मूल डिजाइन को बरकरार रख सकती है।
2026 Brezza की सबसे बड़ी खासियत इसका नया इंजन विकल्प होगा। मौजूदा 1.5-लीटर K15 पेट्रोल इंजन के साथ पहली बार 1.0-लीटर टर्बो-पेट्रोल इंजन भी उपलब्ध कराया जा सकता है। यह विकल्प बेहतर परफॉर्मेंस और दमदार ड्राइविंग अनुभव चाहने वाले ग्राहकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। वहीं CNG वेरिएंट में अंडरबॉडी CNG टैंक लेआउट दिया जा सकता है, जिससे बूट स्पेस पहले की तुलना में अधिक मिलेगा।
नई Brezza के केबिन में फ्रंट वेंटिलेटेड सीट्स, बड़ा टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम, अपडेटेड कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी और एडवांस सेफ्टी फीचर्स जैसे कई नए अपडेट मिलने की उम्मीद है। इन बदलावों के कारण इसकी कीमत में भी मामूली बढ़ोतरी हो सकती है। अनुमान है कि नई Brezza की शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत 8.50 लाख रुपये से शुरू होकर 13.50 लाख रुपये तक जा सकती है। लॉन्च के बाद इसका मुकाबला Tata Nexon, Kia Sonet, Hyundai Venue और Skoda Kylaq जैसी कॉम्पैक्ट एसयूवी से होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर में एक कारोबारी से 50 लाख रुपये की रंगदारी मांगने के मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। जांच में सामने आया कि कथित रंगदारी की पूरी साजिश किसी बाहरी गैंगस्टर ने नहीं, बल्कि कारोबारी की पत्नी ने गोगी गैंग से जुड़े एक आरोपी के साथ मिलकर रची थी। पुलिस ने कारोबारी की पत्नी सपना जैन और गोगी गैंग से जुड़े राजत को गिरफ्तार कर लिया है। अमेरिकी नंबर से मिली थी धमकी पुलिस के अनुसार, 14 जून को कारोबारी को अमेरिका के एक नंबर से कॉल और मैसेज आए थे। कॉल करने वाले ने खुद को गोगी गैंग का सदस्य बताते हुए 50 लाख रुपये की रंगदारी मांगी। आरोपी ने कारोबारी के घर और दुकान की तस्वीरें तथा लोकेशन भेजकर रकम नहीं देने पर पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी थी। शिकायत मिलने के बाद मामला स्पेशल सेल को सौंपा गया। तकनीकी जांच में खुली साजिश तकनीकी विश्लेषण और मुखबिरों से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने सोनीपत निवासी राजत को गिरफ्तार किया। उसके मोबाइल फोन की जांच में कारोबारी की पत्नी सपना जैन और उसकी बहन से लगातार संपर्क के सबूत मिले। इसके बाद पुलिस ने सपना जैन को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की, जिसमें कथित साजिश का खुलासा हुआ। पारिवारिक विवाद बना कथित वजह पुलिस के मुताबिक, कारोबारी और उसकी पत्नी के बीच लंबे समय से पारिवारिक विवाद चल रहा था। पूछताछ में महिला ने आरोप लगाया कि उसकी सास हमेशा बेटे का पक्ष लेती थीं। इसी नाराजगी के चलते उसने कथित तौर पर राजत की मदद से पहले पति से 50 लाख रुपये की उगाही और बाद में सास की हत्या तथा पति पर जानलेवा हमला कराने की योजना बनाई। पुलिस का दावा है कि महिला अपने पति की गतिविधियों और आवाजाही की जानकारी भी आरोपियों तक पहुंचा रही थी। स्पेशल सेल के अनुसार, गिरफ्तार आरोपी राजत पहले भी कई आपराधिक मामलों में शामिल रहा है और गोगी गैंग के सदस्यों के संपर्क में था। पुलिस अब अमेरिका से संचालित कथित रंगदारी नेटवर्क, गैंग के अन्य सदस्यों और इस पूरे मामले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच कर रही है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के औद्योगिक शहर हल्दिया में मंगलवार तड़के बड़ा औद्योगिक हादसा हो गया। हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (HPL) की नैफ्था पाइपलाइन में अचानक भीषण आग लगने से कम से कम 35 लोग गंभीर रूप से झुलस गए। हादसे के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और राहत एवं बचाव कार्य तत्काल शुरू कर दिया गया। सुबह 5 बजे भड़की आग प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग सुबह करीब 5 बजे नैफ्था पाइपलाइन से उठी। नैफ्था अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ होने के कारण आग ने कुछ ही देर में विकराल रूप धारण कर लिया। उस समय आसपास काम कर रहे कई कर्मचारी इसकी चपेट में आ गए। स्थानीय लोगों और प्रशासन की मदद से घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। घायलों का अस्पताल में इलाज जारी जिला प्रशासन के मुताबिक, हादसे में झुलसे सभी घायलों को पहले हल्दिया सब-डिवीजनल अस्पताल ले जाया गया। इनमें से कई की हालत गंभीर होने के कारण उन्हें बेहतर इलाज के लिए तामलुक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल रेफर किया गया है। डॉक्टरों की टीम लगातार घायलों के उपचार में जुटी हुई है। रेल सेवा प्रभावित, दमकल की 12 गाड़ियां मौके पर आग लगने का स्थान हल्दिया और पांसकुड़ा के बीच रेलवे ट्रैक के निकट होने के कारण सुरक्षा के मद्देनजर इस मार्ग पर ट्रेनों की आवाजाही अस्थायी रूप से रोक दी गई। आग पर काबू पाने के लिए शुरुआत में दो दमकल गाड़ियां भेजी गईं, लेकिन आग की तीव्रता को देखते हुए बाद में कुल 12 दमकल वाहन राहत कार्य में लगाए गए। हादसे के कारणों की जांच जारी प्रारंभिक जांच में पाइपलाइन में रिसाव को आग की संभावित वजह माना जा रहा है। हालांकि, HPL प्रबंधन ने बयान जारी कर कहा है कि शुरुआती जानकारी के अनुसार आग कंपनी परिसर के पास स्थित एक अनधिकृत नैफ्था चोरी बिंदु के आसपास लगी थी। कंपनी और प्रशासन की संयुक्त टीम मामले की विस्तृत जांच कर रही है ताकि आग लगने के वास्तविक कारणों का पता लगाया जा सके। साथ ही लोगों से अपील की गई है कि वे ज्वलनशील रसायनों से दूर रहें और सुरक्षा निर्देशों का पालन करें।
नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली सरकार की कैबिनेट ने मंगलवार को नई इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) पॉलिसी 2026 को मंजूरी दे दी है। यह नीति 1 जुलाई 2026 से लागू होगी और 31 मार्च 2030 तक प्रभावी रहेगी। सरकार का लक्ष्य राजधानी में प्रदूषण कम करना और सार्वजनिक परिवहन को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह जीरो-एमिशन बनाना है। पॉलिसी की प्रमुख बातें सरकार अगले चार सालों में ₹15,000 करोड़ खर्च करेगी। 30 लाख रुपये तक की इलेक्ट्रिक कारों पर 100% रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस माफ होगी। पुरानी गाड़ी स्क्रैप कर नई EV खरीदने पर ₹1 लाख तक का प्रोत्साहन राशि दिया जाएगा। हाइब्रिड वाहनों को किसी प्रकार की सब्सिडी या विशेष छूट नहीं मिलेगी; प्रोत्साहन केवल पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों (Pure EVs) के लिए होगा। पेट्रोल और CNG वाहनों पर चरणबद्ध रोक नई नीति के तहत 1 जनवरी 2027 से दिल्ली में केवल इलेक्ट्रिक ऑटो-रिक्शा का ही नया पंजीकरण होगा। वहीं 1 अप्रैल 2028 से नए पेट्रोल और CNG दोपहिया वाहनों का पंजीकरण बंद कर दिया जाएगा। सरकार का उद्देश्य इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ाकर वायु प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी लाना है। चार्जिंग नेटवर्क का होगा विस्तार नई EV नीति के तहत राजधानी में बड़े पैमाने पर चार्जिंग स्टेशन, बैटरी स्वैपिंग नेटवर्क और अन्य आवश्यक बुनियादी ढांचे का विस्तार किया जाएगा, ताकि इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने में लोगों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। सरकार का लक्ष्य 2030 तक दिल्ली को देश के सबसे बड़े इलेक्ट्रिक मोबिलिटी हब के रूप में विकसित करना है।