वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान नीति के मोर्चे पर बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी सीनेट ने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियों पर कांग्रेस का नियंत्रण बढ़ाना था। मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सीनेटरों के अंतिम समय में रुख बदलने से ट्रंप प्रशासन को राहत मिल गई।
प्रस्ताव के रुकने के बाद ट्रंप ने इसे ईरान के लिए "कड़ा संदेश" बताया और अपने सहयोगी सांसदों का धन्यवाद किया।
सीनेट में मतदान के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा,
"वाह! सीनेट ने ईरान पर अपना वोट बदल दिया। रैंड पॉल और बिल कैसिडी ने अपना रुख बदला। नेता जॉन थ्यून, लिंडसे ग्राहम, बर्नी मोरेनो और सभी का धन्यवाद। यह वोट ईरान के लिए एक चेतावनी है।"
ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव अमेरिका की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था।
सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो।
सीनेट ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और इस तरह राष्ट्रपति की मौजूदा युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल विफल हो गई।
इस मतदान का सबसे बड़ा मोड़ दो रिपब्लिकन सांसदों के रुख बदलने से आया।
अंतिम मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और परिणाम 47-50-1 रहा।
मतदान से पहले रैंड पॉल ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी युद्ध शक्तियों को लेकर राय नहीं बदली है।
उन्होंने लिखा कि उनका 'प्रेजेंट' वोट राष्ट्रपति को स्थायी शांति के लिए बातचीत करने की अधिक गुंजाइश देने के उद्देश्य से है।
सीनेटर बिल कैसिडी ने पहले ट्रंप प्रशासन से ईरान संघर्ष को लेकर कई सवाल पूछे थे। उनका कहना था कि सांसदों और जनता को युद्ध की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए।
बाद में उन्होंने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने उन्हें विस्तृत जानकारी दी, जिससे उनकी कई चिंताएं दूर हो गईं।
इसके बाद उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।
रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स और लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया।
वहीं डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साफ हुआ कि ईरान नीति को लेकर मतभेद केवल पार्टी लाइनों तक सीमित नहीं हैं।
अमेरिका में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का तर्क है कि यदि कोई फैसला अमेरिका को बड़े सैन्य संघर्ष की ओर ले जा सकता है, तो उसमें कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए।
वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति के पास त्वरित निर्णय लेने की पर्याप्त संवैधानिक शक्तियां बनी रहनी चाहिए।
ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच सीनेट का यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जबकि राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में बहस आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान नीति के मोर्चे पर बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी सीनेट ने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियों पर कांग्रेस का नियंत्रण बढ़ाना था। मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सीनेटरों के अंतिम समय में रुख बदलने से ट्रंप प्रशासन को राहत मिल गई। प्रस्ताव के रुकने के बाद ट्रंप ने इसे ईरान के लिए "कड़ा संदेश" बताया और अपने सहयोगी सांसदों का धन्यवाद किया। ट्रंप ने जताई खुशी, बोले- ईरान के लिए चेतावनी सीनेट में मतदान के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "वाह! सीनेट ने ईरान पर अपना वोट बदल दिया। रैंड पॉल और बिल कैसिडी ने अपना रुख बदला। नेता जॉन थ्यून, लिंडसे ग्राहम, बर्नी मोरेनो और सभी का धन्यवाद। यह वोट ईरान के लिए एक चेतावनी है।" ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव अमेरिका की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था। राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने की कोशिश नाकाम सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। सीनेट ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और इस तरह राष्ट्रपति की मौजूदा युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल विफल हो गई। दो रिपब्लिकन सांसदों ने बदला फैसला इस मतदान का सबसे बड़ा मोड़ दो रिपब्लिकन सांसदों के रुख बदलने से आया। सीनेटर रैंड पॉल ने इस बार 'प्रेजेंट' वोट किया, यानी उन्होंने पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया। सीनेटर बिल कैसिडी ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के खिलाफ मतदान किया। अंतिम मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और परिणाम 47-50-1 रहा। रैंड पॉल बोले- शांति वार्ता के लिए दिया राष्ट्रपति को मौका मतदान से पहले रैंड पॉल ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी युद्ध शक्तियों को लेकर राय नहीं बदली है। उन्होंने लिखा कि उनका 'प्रेजेंट' वोट राष्ट्रपति को स्थायी शांति के लिए बातचीत करने की अधिक गुंजाइश देने के उद्देश्य से है। बिल कैसिडी ने पहले उठाए सवाल, फिर बदला रुख सीनेटर बिल कैसिडी ने पहले ट्रंप प्रशासन से ईरान संघर्ष को लेकर कई सवाल पूछे थे। उनका कहना था कि सांसदों और जनता को युद्ध की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। बाद में उन्होंने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने उन्हें विस्तृत जानकारी दी, जिससे उनकी कई चिंताएं दूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। कुछ रिपब्लिकन ने किया समर्थन, डेमोक्रेट में भी दिखी अलग राय रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स और लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साफ हुआ कि ईरान नीति को लेकर मतभेद केवल पार्टी लाइनों तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रपति की शक्तियों पर बहस जारी अमेरिका में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का तर्क है कि यदि कोई फैसला अमेरिका को बड़े सैन्य संघर्ष की ओर ले जा सकता है, तो उसमें कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए। वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति के पास त्वरित निर्णय लेने की पर्याप्त संवैधानिक शक्तियां बनी रहनी चाहिए। ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच सीनेट का यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जबकि राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में बहस आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
Ship Attack in Hormuz Strait: मध्य पूर्व में हालात सामान्य होने की उम्मीदों के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। ओमान के समुद्री क्षेत्र के पास सिंगापुर के झंडे वाले एक मालवाहक जहाज पर कथित हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (IMO) ने खाड़ी क्षेत्र से फंसे जहाजों की निकासी का अभियान अस्थायी रूप से रोक दिया है। घटना के बाद समुद्री सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। ओमान के पास मालवाहक जहाज पर हमला ब्रिटिश समुद्री सुरक्षा एजेंसी UK Maritime Trade Operations (UKMTO) के अनुसार, सिंगापुर के झंडे वाला मालवाहक जहाज एवर लवली (Ever Lovely) ओमान के समुद्री क्षेत्र के पास गुजर रहा था, तभी उस पर एक प्रोजेक्टाइल से हमला किया गया। हमले में हुए नुकसान और हताहतों को लेकर अभी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। यह घटना ऐसे समय हुई है जब ईरान पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को तय समुद्री मार्गों का पालन करने की चेतावनी दे चुका था। IMO ने सुरक्षा समीक्षा तक रोका निकासी अभियान हमले के बाद इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (IMO) ने खाड़ी क्षेत्र से फंसे जहाजों और नाविकों को सुरक्षित निकालने का अपना स्वैच्छिक अभियान अस्थायी रूप से रोक दिया है। IMO के महासचिव आर्सेनियो डोमिंग्वेज ने कहा कि अभियान को तब तक रोका गया है, जब तक यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि निकासी सूची में शामिल सभी जहाजों और पूरे क्षेत्र में मौजूद अन्य पोतों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध है। एजेंसी ने स्पष्ट किया कि जिस जहाज पर हमला हुआ, वह उसके निकासी अभियान का हिस्सा नहीं था। दो वैकल्पिक समुद्री मार्ग बनाए गए थे IMO ने खाड़ी क्षेत्र से जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए दो वैकल्पिक समुद्री मार्ग निर्धारित किए थे। इनमें एक मार्ग ईरानी जलक्षेत्र से होकर गुजरता था, जबकि दूसरा ओमान के समुद्री क्षेत्र से होकर। इस पूरी प्रक्रिया पर अमेरिका भी नजर बनाए हुए था। लेकिन ताजा हमले के बाद इन दोनों मार्गों की सुरक्षा पर सवाल उठने लगे हैं। ईरान ने दोहराया अपना रुख ईरान ने संकेत दिया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन व्यवस्था पर उसका नियंत्रण जारी रहेगा। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा कि केवल तेहरान द्वारा निर्धारित समुद्री मार्गों पर ही सुरक्षित आवाजाही की गारंटी दी जा सकती है। संगठन ने चेतावनी दी कि निर्धारित रास्तों का पालन नहीं करने वाले जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। ब्रिटिश समुद्री सुरक्षा कंपनी एम्ब्रे (Ambrey) ने भी दावा किया कि गुरुवार को IRGC ने पनामा के झंडे वाले दो जहाजों को अपना मार्ग बदलने के निर्देश दिए। तेल बाजार में दिखा तत्काल असर हमले की खबर सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में करीब 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। निवेशकों को आशंका है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दुनिया के कुल समुद्री तेल और प्राकृतिक गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रणनीतिक जलमार्ग से होकर गुजरता है। युद्धविराम के बाद बढ़ रही थी जहाजों की आवाजाही ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम लागू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य होने लगी थी। समुद्री डेटा फर्म Lloyd's List Intelligence के अनुसार, पिछले सप्ताह इस मार्ग से 125 जहाज गुजरे, जबकि उससे पहले केवल 33 जहाजों ने इस रास्ते का इस्तेमाल किया था। बुधवार को 78 जहाजों की आवाजाही युद्ध शुरू होने के बाद का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा रही। ताजा हमले के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री यातायात की रफ्तार एक बार फिर प्रभावित हो सकती है। अमेरिका ने जताया भरोसा अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। उनके अनुसार, पिछले 24 घंटों में इस मार्ग से करीब 2 करोड़ बैरल तेल का परिवहन हुआ, जो संघर्ष से पहले के स्तर के करीब माना जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है।
New York Democratic Primary: न्यूयॉर्क की डेमोक्रेटिक प्राइमरी में भले ही जोहरान ममदानी खुद चुनाव मैदान में नहीं थे, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद वह सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरे हैं। उनके समर्थन वाले तीनों उम्मीदवारों ने अपने-अपने मुकाबले में जीत दर्ज की है। इन नतीजों के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर ममदानी की राजनीतिक पकड़ और मजबूत मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक अब उन्हें पार्टी का नया 'किंगमेकर' बता रहे हैं। ममदानी समर्थित उम्मीदवारों में ब्रैड लैंडर ने मौजूदा सांसद डैन गोल्डमैन को हराया। वहीं क्लेयर वाल्डेज ने ब्रुकलिन बरो प्रेसिडेंट एंटोनियो रेनोसो को मात दी। तीसरे मुकाबले में डारियालिजा एविला शेवेलियर ने अनुभवी नेता एड्रियानो एस्पाइलाट को हराकर सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर दिया। चूंकि इन सीटों पर डेमोक्रेटिक पार्टी का मजबूत आधार है, इसलिए नवंबर में होने वाले आम चुनाव में इन उम्मीदवारों की जीत की संभावना भी काफी अधिक मानी जा रही है. ममदानी बोले- यह सिर्फ शुरुआत है तीनों उम्मीदवारों की जीत के बाद जोहरान ममदानी ने कहा कि उनकी राजनीतिक सफलता कोई संयोग नहीं है। उन्होंने कहा कि पिछले साल की जीत केवल एक शुरुआत थी और अब उनकी राजनीतिक विचारधारा व्यापक स्तर पर स्वीकार की जा रही है। ममदानी ने कहा कि उनका संगठन केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे उम्मीदवारों को भी आगे बढ़ा रहा है जो आम लोगों के मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं। तीनों मुकाबलों में कैसे बदला राजनीतिक समीकरण? ब्रैड लैंडर ने डैन गोल्डमैन को दी मात सबसे चर्चित मुकाबला लोअर मैनहट्टन और ब्रुकलिन सीट पर हुआ, जहां ब्रैड लैंडर ने मौजूदा सांसद डैन गोल्डमैन को हराया। चुनाव प्रचार के दौरान लैंडर ने खुद को अधिक प्रगतिशील उम्मीदवार के रूप में पेश किया। ममदानी ने खुलकर उनके समर्थन में प्रचार किया, जिसका चुनाव परिणाम पर असर देखने को मिला। क्लेयर वाल्डेज ने पलट दिया मुकाबला ब्रुकलिन और क्वींस की सीट पर क्लेयर वाल्डेज ने एंटोनियो रेनोसो को हराकर सभी को चौंका दिया। यह सीट सांसद निडिया वेलाजक्वेज के हटने के बाद खाली हुई थी। ममदानी के समर्थन से वाल्डेज को युवा और प्रगतिशील मतदाताओं का बड़ा समर्थन मिला। डारियालिजा एविला शेवेलियर की ऐतिहासिक जीत सबसे बड़ा उलटफेर डारियालिजा एविला शेवेलियर ने किया। उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एड्रियानो एस्पाइलाट को हराया, जो करीब एक दशक से कांग्रेस में थे। इस जीत को न्यूयॉर्क की राजनीति के सबसे बड़े उलटफेरों में गिना जा रहा है। क्यों कहा जा रहा है 'किंगमेकर'? राजनीति में किसी नेता का उम्मीदवारों का समर्थन करना सामान्य बात है, लेकिन जोहरान ममदानी के समर्थन वाले तीनों उम्मीदवारों की जीत ने उनकी राजनीतिक ताकत को नई पहचान दी है। खास बात यह रही कि दो उम्मीदवारों ने मौजूदा सांसदों को हराया, जबकि तीसरे ने एक मजबूत राजनीतिक दावेदार को चुनावी मैदान में मात दी। ममदानी की कम्युनिकेशन डायरेक्टर अन्ना बह्र ने कहा कि यह नतीजे दिखाते हैं कि आम लोगों के मुद्दों पर आधारित राजनीति अब पारंपरिक चुनावी रणनीतियों पर भारी पड़ रही है। गाजा और इजरायल मुद्दा भी बना चुनावी केंद्र इन प्राइमरी चुनावों में गाजा युद्ध और अमेरिका की इजरायल नीति भी प्रमुख मुद्दा रही। ममदानी और उनके समर्थित उम्मीदवारों ने महंगाई, आवास संकट और आम लोगों की आर्थिक परेशानियों को अमेरिकी विदेश नीति से जोड़कर चुनाव प्रचार किया। इस रुख को लेकर उन्हें न्यूयॉर्क के कुछ यहूदी संगठनों और नेताओं की आलोचना का भी सामना करना पड़ा। डैन गोल्डमैन ने आरोप लगाया कि ममदानी का अभियान मध्य-पूर्व के मुद्दों को जरूरत से ज्यादा महत्व दे रहा है, जिससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। डेमोक्रेटिक पार्टी में बढ़ा ममदानी का कद ताजा चुनाव परिणामों के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर जोहरान ममदानी का प्रभाव पहले से कहीं अधिक मजबूत माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि उनके समर्थित उम्मीदवार नवंबर के आम चुनाव में भी जीत हासिल करते हैं, तो ममदानी आने वाले वर्षों में पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।