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Iran’s War Strategy: Missiles Over Fighter Jets

ईरान ने क्यों नहीं उतारे फाइटर जेट? अमेरिका-इजरायल के खिलाफ जंग में ‘हवाई सन्नाटा’ की पूरी रणनीति समझिए

surbhi मार्च 17, 2026 0
Iranian drones and missiles in action highlighting strategy over fighter jets in Middle East conflict
Iran Drone Missile Strategy vs Fighter Jets

मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष को 18 दिन हो चुके हैं, जहां ईरान लगातार इजरायल और अमेरिका के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहा है। लेकिन इस पूरी जंग में एक बात सबसे ज्यादा चर्चा में है- ईरान ने अब तक अपने लड़ाकू विमानों (फाइटर जेट्स) का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? क्या यह कमजोरी है या सोची-समझी सैन्य रणनीति?

 

ईरान की एयरफोर्स: पुरानी ताकत, सीमित क्षमता

ईरान की इस्लामिक रिपब्लिक एयर फोर्स (IRIAF) के पास कागजों पर 400-600 विमान जरूर हैं, लेकिन इनमें से केवल 200-230 के आसपास ही फाइटर जेट हैं। इनमें से ज्यादातर विमान 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले खरीदे गए थे, जब ईरान के पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका से अच्छे संबंध थे।

ईरान के प्रमुख लड़ाकू विमान:

  • F-14 Tomcat – दुनिया में अब सिर्फ ईरान के पास सक्रिय
     
  • F-4 Phantom II और F-5 Tiger II – 1960-70 के दशक के
     
  • MiG-29 और Su-24 – सीमित संख्या में
     
  • स्वदेशी जेट: Kowsar और Saeqeh
     

विशेषज्ञों के अनुसार, ये स्वदेशी जेट भी आधुनिक नहीं बल्कि पुराने अमेरिकी डिजाइनों के अपग्रेडेड संस्करण हैं।

 

क्यों नहीं उतार रहा ईरान अपने फाइटर जेट?

1. तकनीकी रूप से पिछड़े विमान

ईरान के अधिकांश जेट पुराने हैं और उनमें आधुनिक रडार, स्टेल्थ और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम की कमी है। इसके मुकाबले इजरायल के पास F-35 Lightning II जैसे अत्याधुनिक स्टेल्थ जेट हैं, जो रडार से बच निकलते हैं।

2. एयर डिफेंस का बड़ा खतरा

अमेरिका और इजरायल के पास मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम हैं जैसे:

  • Iron Dome
  • Patriot Missile System

ऐसे में ईरानी जेट दुश्मन के इलाके में घुसते ही मार गिराए जा सकते हैं।

3. स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस की समस्या

अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान को पुराने जेट्स के लिए जरूरी पार्ट्स नहीं मिलते। इससे कई विमान सिर्फ सीमित समय तक ही उड़ान भर सकते हैं या पूरी तरह निष्क्रिय हैं।

4. लंबी दूरी और रिफ्यूलिंग की कमी

ईरान और इजरायल के बीच सीधी सीमा नहीं है। ऐसे में जेट्स को लंबी दूरी तय करनी होगी, जिसके लिए हवा में ईंधन भरने (air-to-air refueling) की जरूरत होती है- इसमें ईरान कमजोर है।

 

मिसाइल और ड्रोन: ईरान की असली ताकत

जहां फाइटर जेट कमजोर हैं, वहीं ईरान ने मिसाइल और ड्रोन टेक्नोलॉजी में भारी निवेश किया है।

मुख्य हथियार:

  • बैलिस्टिक मिसाइल: Fateh-110, Sejjil
     
  • क्रूज मिसाइल: Soumar
     
  • ड्रोन: Shahed-136
     

इनकी खासियत:

  • लंबी दूरी तक सटीक हमला
     
  • कम लागत (एक ड्रोन ~20,000 डॉलर)
     
  • बड़ी संख्या में एक साथ इस्तेमाल
     

इसके उलट, एक इंटरसेप्टर मिसाइल (जैसे पैट्रियट) की कीमत 30-40 लाख डॉलर तक होती है। यानी ईरान “कम लागत में ज्यादा नुकसान” की रणनीति अपना रहा है।

 

रणनीति या मजबूरी?

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • यह पूरी तरह कमजोरी नहीं, बल्कि “असिमेट्रिक वॉरफेयर” (Asymmetric Warfare) की रणनीति है
     
  • ईरान जानबूझकर अपने जेट्स को बचाकर रख रहा है
     
  • ड्रोन और मिसाइल से दुश्मन के संसाधनों को थका रहा है
     

ईरान का फाइटर जेट इस्तेमाल न करना उसकी कमजोरी कम, रणनीति ज्यादा दिखता है। वह सीधे हवाई युद्ध में उतरने के बजाय कम लागत वाले और प्रभावी हथियारों- मिसाइल और ड्रोन- के जरिए दबाव बना रहा है।

 

 

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Mahmoud Ahmadinejad amid reports of alleged US-Israel plan for regime change in Iran
ईरान में सत्ता परिवर्तन की बड़ी साजिश  रिपोर्ट में दावा- अहमदीनेजाद को दोबारा लाना चाहते थे अमेरिका और इजरायल

Iran को लेकर एक नई रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। दावा किया गया है कि United States और Israel का सैन्य अभियान केवल ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को निशाना बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे तेहरान में सत्ता परिवर्तन की बड़ी रणनीति भी शामिल थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना में ईरान के पूर्व राष्ट्रपति Mahmoud Ahmadinejad को दोबारा सत्ता में लाने की कोशिश की जा रही थी। हालांकि एक हमले और बाद की घटनाओं ने इस पूरी रणनीति को कमजोर कर दिया। क्या था कथित प्लान? The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल ने कथित “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के जरिए ईरान के शीर्ष नेतृत्व को कमजोर करने की योजना बनाई थी। दावा किया गया कि इस ऑपरेशन के मुख्य उद्देश्य थे: ईरान के सैन्य और परमाणु ढांचे को नुकसान पहुंचाना शीर्ष नेतृत्व को खत्म करना देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना वैकल्पिक सत्ता व्यवस्था तैयार करना रिपोर्ट में कहा गया कि सार्वजनिक तौर पर अमेरिका केवल परमाणु खतरे की बात करता रहा, लेकिन इजरायल इससे कहीं बड़े राजनीतिक बदलाव की तैयारी में था। खामेनेई की मौत से बढ़ा संकट रिपोर्ट के मुताबिक, 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि सर्वोच्च नेता Ali Khamenei और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी हमलों में मारे गए। खामेनेई करीब 37 वर्षों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे थे। उनकी मौत के बाद देशभर में 40 दिनों का शोक घोषित किया गया और सत्ता को लेकर अस्थिरता बढ़ गई। अमेरिका और इजरायल को उम्मीद थी कि नेतृत्व हटते ही ईरानी सत्ता ढांचा बिखर जाएगा, लेकिन ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ। अहमदीनेजाद को “मुक्त” कराने की कोशिश? रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान के पूर्वी हिस्से में एक गुप्त अभियान चलाया गया, जहां महमूद अहमदीनेजाद कथित तौर पर नजरबंद थे। बताया गया कि हमला सीधे उनके घर पर नहीं, बल्कि उस सुरक्षा चौकी पर किया गया जहां Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के जवान तैनात थे। सैटेलाइट तस्वीरों में सुरक्षा चौकी तबाह दिखाई गई, जबकि अहमदीनेजाद का घर सुरक्षित बताया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, हमले में अहमदीनेजाद घायल हुए लेकिन बच गए। क्यों अहम थे अहमदीनेजाद? महमूद अहमदीनेजाद 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे। अपने कार्यकाल में वह पश्चिम विरोधी बयानों, परमाणु कार्यक्रम और इजरायल पर तीखे रुख को लेकर चर्चा में रहे। हालांकि बाद के वर्षों में उनका टकराव खामेनेई समर्थक सत्ता प्रतिष्ठान से बढ़ गया था। उन्होंने ईरानी शासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे और बाद में उन्हें चुनाव लड़ने से भी रोका गया। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि मौजूदा सत्ता से उनकी दूरी उन्हें “संक्रमणकालीन नेतृत्व” के लिए उपयोगी बना सकती है। हमला फेल हुआ तो बिखर गई रणनीति रिपोर्ट में दावा किया गया कि हमले के बाद अहमदीनेजाद सार्वजनिक जीवन से अचानक गायब हो गए। उनके पीछे हटने से सत्ता परिवर्तन की पूरी योजना कमजोर पड़ गई। इसके अलावा: ईरान में बड़े पैमाने पर जनविद्रोह नहीं हुआ राजनीतिक ढांचा पूरी तरह नहीं टूटा कुर्द समूहों ने अपेक्षित भूमिका नहीं निभाई वैकल्पिक नेतृत्व उभर नहीं पाया इन वजहों से कथित योजना अधूरी रह गई। ट्रंप और नेतन्याहू के बयान भी चर्चा में रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu दोनों ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि ईरान में बदलाव “अंदर से” आना चाहिए। हालांकि रिपोर्ट का दावा है कि पर्दे के पीछे कहीं बड़ी रणनीति पर काम हो रहा था। सिर्फ एयरस्ट्राइक नहीं, ‘इन्फ्लुएंस ऑपरेशन’ भी रिपोर्ट के मुताबिक, योजना में केवल हवाई हमले ही नहीं बल्कि: साइकोलॉजिकल ऑपरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाना सोशल अस्थिरता बढ़ाना कुर्द लड़ाकों को सक्रिय करना जैसी रणनीतियां भी शामिल थीं, ताकि जनता में यह संदेश जाए कि ईरानी शासन नियंत्रण खो चुका है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की राजनीति और ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।  

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Russian President Vladimir Putin meets Chinese President Xi Jinping in Beijing amid global diplomatic tensions
ट्रंप की बीजिंग यात्रा के बाद चीन पहुंचे पुतिन, शी जिनपिंग के साथ हुई अहम बैठक

Vladimir Putin ने बुधवार को China की राजधानी बीजिंग में राष्ट्रपति Xi Jinping से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिन पहले Donald Trump चीन दौरे पर गए थे। ऐसे में पुतिन की यह यात्रा वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई वैश्विक मुद्दों पर हुई चर्चा बीजिंग में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की। इनमें प्रमुख रूप से: ईरान संकट यूक्रेन युद्ध वैश्विक व्यापार पश्चिम एशिया की स्थिति ऊर्जा सुरक्षा रणनीतिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने तथा बदलते वैश्विक हालात में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में हुआ स्वागत बीजिंग स्थित Great Hall of the People में शी जिनपिंग ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन का औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच विस्तृत वार्ता हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन मंगलवार रात बीजिंग पहुंचे थे, जहां उनका स्वागत चीन के विदेश मंत्री Wang Yi ने किया। पुतिन बोले- रिश्ते अभूतपूर्व स्तर पर चीन यात्रा से पहले जारी अपने वीडियो संदेश में पुतिन ने कहा कि रूस और चीन के संबंध “अभूतपूर्व स्तर” तक पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे उच्चस्तरीय संपर्क रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बना रहे हैं और सहयोग की नई संभावनाएं खोल रहे हैं। चीन ने क्या कहा? चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने कहा कि शी जिनपिंग और पुतिन के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर गहन चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुतिन की 25वीं चीन यात्रा है, जो दोनों देशों के मजबूत संबंधों को दर्शाती है। ट्रंप की यात्रा के बाद बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बैठक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। 14 और 15 मई को ट्रंप ने चीन का दौरा किया था, जहां उनकी और शी जिनपिंग की बातचीत में भी ईरान, यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद पुतिन का बीजिंग पहुंचना चीन-रूस संबंधों की रणनीतिक गहराई को दिखाता है। ईरान और होर्मुज संकट पर भी फोकस पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। खास तौर पर Iran द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े कदमों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ गई है। रूस, चीन और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान से आयात करता रहा है। वैश्विक राजनीति में बढ़ती रूस-चीन साझेदारी विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के बीच रूस और चीन लगातार एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, डॉलर पर निर्भरता कम करने और पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में सहयोग बढ़ा रहे हैं।  

surbhi मई 20, 2026 0
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Vladimir Putin and Xi Jinping expected to attend BRICS Summit 2026 in New Delhi with global leaders
BRICS Summit 2026: पुतिन के साथ शी जिनपिंग भी आ सकते हैं भारत, दिल्ली में जुटेंगे दुनिया के बड़े नेता

BRICS Summit 2026 को लेकर बड़ी कूटनीतिक हलचल शुरू हो गई है। सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में Vladimir Putin के साथ-साथ Xi Jinping के भी शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, Russia और China दोनों ने भारत को संकेत दिए हैं कि उनके शीर्ष नेता 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में भाग ले सकते हैं। इस बार India BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। 2019 के बाद पहली भारत यात्रा हो सकती है यदि शी जिनपिंग का दौरा तय होता है, तो यह अक्टूबर 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। आखिरी बार वह तमिलनाडु के मामल्लापुरम में भारत-चीन अनौपचारिक शिखर वार्ता में शामिल होने आए थे। 2020 के बाद बिगड़े थे रिश्ते भारत और चीन के संबंध अप्रैल-मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुए गलवान सैन्य गतिरोध के बाद काफी तनावपूर्ण हो गए थे। हालांकि अक्टूबर 2024 में Kazan में आयोजित BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। उसी दौरान दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में सैनिकों की वापसी को लेकर सहमति जताई थी। पिछले डेढ़ साल में रिश्तों में आई नरमी पिछले कुछ समय में भारत और चीन के संबंधों में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें दोबारा शुरू हुईं वीजा सेवाएं बहाल की गईं कुछ चीनी कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी गई कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हुई हालांकि सीमा पर अब भी बड़ी संख्या में सैनिक तैनात हैं और तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विदेश मंत्रियों की बैठक में तय हुआ एजेंडा हाल ही में नई दिल्ली में BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी, जिसमें शिखर सम्मेलन के एजेंडे पर चर्चा की गई। Sergey Lavrov इस बैठक में शामिल हुए थे, जबकि Wang Yi बीजिंग में व्यस्तता के कारण नहीं आ सके। उनकी जगह भारत में चीन के राजदूत Xu Feihong ने भाग लिया। सूत्रों के मुताबिक, अगर कोई अप्रत्याशित परिस्थिति नहीं बनी तो BRICS देशों की ओर से शीर्ष स्तर पर भागीदारी की जानकारी जल्द आधिकारिक रूप से दी जा सकती है। पुतिन की यात्रा लगभग तय रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूस ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के BRICS सम्मेलन में शामिल होने की पुष्टि कर दी है। यह एक साल के भीतर उनकी दूसरी भारत यात्रा होगी। इससे पहले दिसंबर 2025 में वह भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने भारत आए थे। पश्चिम एशिया युद्ध पर साझा रुख बनाने की कोशिश BRICS संगठन की स्थापना 2006 में हुई थी। शुरुआत में इसमें Brazil, Russia, India, China और South Africa शामिल थे। बाद में Egypt, Ethiopia, Iran, United Arab Emirates और Indonesia भी इस समूह में शामिल हुए। BRICS अब दुनिया की लगभग 49 प्रतिशत आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया युद्ध पर नजर भारत चाहता है कि BRICS देश पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और Iran संकट पर साझा कूटनीतिक रुख अपनाएं। हालांकि इस मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। विशेष रूप से ईरान और United Arab Emirates के अलग-अलग रुख के कारण साझा बयान तैयार करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। पिछले सप्ताह हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में भी इस मुद्दे पर पूरी सहमति नहीं बन सकी थी।  

surbhi मई 20, 2026 0
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