नई दिल्ली, एजेंसियां। देश में सोना और चांदी की कीमतों में लगातार तेजी का दौर जारी है। सोमवार, 20 अप्रैल को भी दोनों कीमती धातुओं के दामों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत 10 ग्राम पर ₹347 बढ़कर ₹1,52,002 पहुंच गई, जबकि चांदी ₹1,214 महंगी होकर ₹2,51,000 प्रति किलोग्राम के स्तर को पार कर गई। लगातार बढ़ती कीमतों ने निवेशकों के साथ-साथ आभूषण खरीदने वाले ग्राहकों की भी चिंता बढ़ा दी है।
आईबीजेए के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2026 की शुरुआत से अब तक सोने की कीमत में करीब ₹19,000 प्रति 10 ग्राम की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं, चांदी लगभग ₹21,000 प्रति किलो महंगी हो चुकी है। इस दौरान दोनों धातुओं ने रिकॉर्ड स्तर भी छुआ। 29 जनवरी को चांदी की कीमत ₹3.86 लाख प्रति किलो तक पहुंच गई थी, जो अब तक का उच्चतम स्तर माना जा रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, डॉलर में उतार-चढ़ाव और सुरक्षित निवेश की बढ़ती मांग को इस तेजी की प्रमुख वजह माना जा रहा है।
दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, जयपुर, भोपाल और लखनऊ सहित देश के प्रमुख शहरों में 24 कैरेट सोने की कीमत ₹1.55 लाख से ₹1.56 लाख प्रति 10 ग्राम के बीच बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि सोने के बढ़ते दामों के बीच ग्राहकों को खरीदारी करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। केवल BIS हॉलमार्क वाला प्रमाणित सोना ही खरीदें और खरीदारी से पहले विश्वसनीय स्रोतों से ताजा कीमत की पुष्टि अवश्य करें। इससे नकली आभूषण या गलत मूल्य वसूले जाने जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। देश में सोना और चांदी की कीमतों में लगातार तेजी का दौर जारी है। सोमवार, 20 अप्रैल को भी दोनों कीमती धातुओं के दामों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत 10 ग्राम पर ₹347 बढ़कर ₹1,52,002 पहुंच गई, जबकि चांदी ₹1,214 महंगी होकर ₹2,51,000 प्रति किलोग्राम के स्तर को पार कर गई। लगातार बढ़ती कीमतों ने निवेशकों के साथ-साथ आभूषण खरीदने वाले ग्राहकों की भी चिंता बढ़ा दी है। इस साल रिकॉर्ड तेजी, हजारों रुपये महंगे हुए सोना-चांदी आईबीजेए के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2026 की शुरुआत से अब तक सोने की कीमत में करीब ₹19,000 प्रति 10 ग्राम की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं, चांदी लगभग ₹21,000 प्रति किलो महंगी हो चुकी है। इस दौरान दोनों धातुओं ने रिकॉर्ड स्तर भी छुआ। 29 जनवरी को चांदी की कीमत ₹3.86 लाख प्रति किलो तक पहुंच गई थी, जो अब तक का उच्चतम स्तर माना जा रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, डॉलर में उतार-चढ़ाव और सुरक्षित निवेश की बढ़ती मांग को इस तेजी की प्रमुख वजह माना जा रहा है। बड़े शहरों में भी ऊंचे दाम, खरीदारी से पहले बरतें सावधानी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, जयपुर, भोपाल और लखनऊ सहित देश के प्रमुख शहरों में 24 कैरेट सोने की कीमत ₹1.55 लाख से ₹1.56 लाख प्रति 10 ग्राम के बीच बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि सोने के बढ़ते दामों के बीच ग्राहकों को खरीदारी करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। केवल BIS हॉलमार्क वाला प्रमाणित सोना ही खरीदें और खरीदारी से पहले विश्वसनीय स्रोतों से ताजा कीमत की पुष्टि अवश्य करें। इससे नकली आभूषण या गलत मूल्य वसूले जाने जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है।
नई दिल्ली: भारतीय परिवारों के पास अनुमानित 30,000 टन से अधिक सोना मौजूद है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा वर्षों से घरों और लॉकरों में निष्क्रिय पड़ा है। अब इस सोने को आर्थिक गतिविधियों में लाने के लिए केंद्र सरकार Gold Monetisation Scheme (GMS) का नया संस्करण तैयार कर रही है। इस बार योजना में पहली बार जूलर्स (सर्राफा कारोबारियों) को भी महत्वपूर्ण भूमिका देने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य सोने के आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू गोल्ड संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और निष्क्रिय पड़े सोने को वित्तीय प्रणाली से जोड़ना है। अगस्त में आ सकता है नया वर्जन रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार ने हाल के दिनों में वरिष्ठ मंत्रियों, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), बैंकों और बुलियन इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर की बैठकें की हैं। इन चर्चाओं के बाद योजना को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, Gold Monetisation Scheme का नया संस्करण अगस्त 2026 में घोषित किया जा सकता है, ताकि त्योहारी सीजन से पहले इसे लागू किया जा सके। पहली बार जूलर्स को मिलेगी अहम जिम्मेदारी नई व्यवस्था के तहत जूलर्स केवल सोना बेचने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे कलेक्शन और एग्रीगेशन सेंटर की भूमिका निभा सकते हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार— ग्राहक अपना सोना जूलर्स के पास जमा कर सकेंगे। जूलर्स सोने की प्रारंभिक जांच और सत्यापन करेंगे। इसके बाद सोना अधिकृत रिफाइनर्स और बैंकों तक पहुंचाया जाएगा। पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और ट्रेसेबिलिटी सुनिश्चित करने पर जोर रहेगा। इसके बदले जूलर्स को सोने के संग्रह, परीक्षण, जमा प्रक्रिया और अन्य सेवाओं के लिए सर्विस या हैंडलिंग फीस मिलने की संभावना है। सरकार का फोकस आयात कम करने पर भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में शामिल है। बढ़ती वैश्विक कीमतों और आयात शुल्क में वृद्धि का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ा है। मई 2026 में सोने का आयात घटकर करीब 12 अरब डॉलर रह गया। सरकार का मानना है कि यदि घरों में रखा निष्क्रिय सोना वित्तीय प्रणाली में आए, तो आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। 2015 में शुरू हुई थी योजना, लेकिन नहीं मिली सफलता सरकार ने पहली बार 2015 में Gold Monetisation Scheme शुरू की थी। इस योजना के तहत लोग अपना सोना बैंक में जमा कर ब्याज कमा सकते थे। हालांकि, यह योजना अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। इंडस्ट्री के अनुसार, लगभग 11 वर्षों में केवल 39 टन सोना ही इस योजना के जरिए प्रणाली में आ सका। आखिर क्यों नहीं चली Gold Monetisation Scheme? विशेषज्ञों के मुताबिक योजना के सीमित प्रभाव के पीछे कई कारण रहे— भारतीय परिवारों का सोने से भावनात्मक जुड़ाव। आभूषण जमा कराने को लेकर भरोसे की कमी। ब्याज दरें अपेक्षाकृत कम होना। प्रक्रिया का जटिल और समय लेने वाला होना। मीडियम और लॉन्ग-टर्म डिपॉजिट विकल्प बंद होना। वर्तमान में योजना के तहत केवल एक से तीन वर्ष की शॉर्ट-टर्म बैंक डिपॉजिट सुविधा उपलब्ध है। क्या बदलेगी नई योजना की तस्वीर? सरकार को उम्मीद है कि यदि जूलर्स को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तो लोगों का भरोसा बढ़ेगा और योजना तक पहुंच आसान होगी। इससे घरों में रखा निष्क्रिय सोना आर्थिक गतिविधियों में शामिल हो सकेगा, जिससे आयात पर दबाव कम करने और गोल्ड इकोसिस्टम को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
नई दिल्ली: टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons) एक बार फिर सुर्खियों में है। कंपनी के सबसे बड़े अल्पसंख्यक (Minority) शेयरधारक शापूरजी पल्लोनजी (SP) ग्रुप ने अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को आधार बनाकर ₹25,500 करोड़ के बॉन्ड जारी करने की योजना बनाई है। इस कदम के बाद टाटा संस की संभावित लिस्टिंग (IPO) को लेकर चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, SP Group सोमवार को यह बॉन्ड इश्यू लॉन्च कर सकता है। इस बॉन्ड की शर्तों में टाटा संस की भविष्य की लिस्टिंग या फिर SP Group और टाटा संस के बीच हिस्सेदारी को लेकर किसी समझौते की संभावना भी शामिल बताई जा रही है। क्या है पूरा मामला? टाटा संस में SP Group की 18.37% हिस्सेदारी है, जिससे वह कंपनी का सबसे बड़ा माइनॉरिटी शेयरधारक है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रुप इस हिस्सेदारी के एक हिस्से का इस्तेमाल ₹25,500 करोड़ जुटाने के लिए करेगा। इसके लिए Zero Coupon, Unlisted और Unrated Non-Convertible Debentures (NCDs) जारी किए जाएंगे। बताया गया है कि Equigene Investments इन बॉन्ड्स को जारी करेगी, जबकि Cyrus Investments टाटा संस के शेयरों को गिरवी (Collateral) के रूप में रखेगी। IPO की शर्त भी जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, इस बॉन्ड इश्यू की शर्तों में यह भी शामिल है कि 18 महीने के भीतर या तो— टाटा संस अपने IPO की घोषणा करे, या SP Group और टाटा संस के बीच हिस्सेदारी को लेकर कोई समाधान या समझौता हो। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि टाटा संस का IPO तय हो गया है। यह केवल बॉन्ड इश्यू से जुड़ी एक संभावित शर्त बताई जा रही है। RBI के नियमों ने बढ़ाई हलचल हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपर-लेयर NBFC के लिए नए नियामकीय प्रावधान लागू किए हैं। इन नियमों के अनुसार, जिन कंपनियों की कुल परिसंपत्तियां (Assets) ₹1 लाख करोड़ से अधिक हैं और जिन्हें Upper Layer NBFC के रूप में वर्गीकृत किया गया है, उन्हें सूचीबद्ध (Listed) होना पड़ सकता है। टाटा संस की परिसंपत्तियां ₹1.75 लाख करोड़ से अधिक बताई जाती हैं और RBI ने उसे पहले ही Upper Layer NBFC के रूप में वर्गीकृत किया है। इसी वजह से कंपनी की संभावित लिस्टिंग को लेकर चर्चाएं लगातार बनी हुई हैं। टाटा समूह के भीतर भी अलग-अलग राय टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर समूह के भीतर भी अलग-अलग मत सामने आते रहे हैं। पहले Tata Trusts ने प्रस्ताव पारित कर कंपनी को अनलिस्टेड बनाए रखने का समर्थन किया था। वहीं, कंपनी के उपाध्यक्ष वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने लिस्टिंग को कंपनी और निवेशकों के लिए फायदेमंद बताया था। दूसरी ओर, Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा सार्वजनिक रूप से कंपनी की लिस्टिंग का विरोध कर चुके हैं। कब आएगा बॉन्ड इश्यू? रिपोर्ट्स के अनुसार— बॉन्ड इश्यू सोमवार को लॉन्च किया जा सकता है। अगले सप्ताह इसके सेटलमेंट की प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है। हालांकि, इस पूरे मामले पर SP Group की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। निवेशकों की नजर आगे की घटनाओं पर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर कोई ठोस कदम उठाया जाता है, तो यह भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक हो सकता है। फिलहाल बाजार की नजर RBI के नियामकीय रुख, SP Group की रणनीति और टाटा समूह के अगले फैसलों पर बनी हुई है।