पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार मुकाबला सिर्फ रैलियों और जनसभाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी जबरदस्त लड़ाई देखने को मिल रही है। सत्ताधारी All India Trinamool Congress (TMC) ने Bharatiya Janata Party (BJP) के डिजिटल अभियान का मुकाबला करने के लिए बड़े पैमाने पर रणनीति तैयार की है।
मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की पार्टी ने राज्यभर में 1.5 लाख से ज्यादा WhatsApp ग्रुप बनाए हैं, जिनसे 1 करोड़ से अधिक लोगों को जोड़ा गया है। इन ग्रुप्स के जरिए चुनावी संदेश, वीडियो और कंटेंट तेज़ी से लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।
TMC का फोकस इस बार डिजिटल स्तर पर लोकल नेटवर्क मजबूत करने पर है, जबकि BJP का अभियान अधिकतर केंद्रीय स्तर से संचालित बताया जा रहा है।
TMC अपने ‘Didir Doot’ ऐप के जरिए कार्यकर्ताओं और समर्थकों को जोड़ने में जुटी है।
इस ऐप के जरिए यूजर्स को टास्क, रियल-टाइम अपडेट, क्विज़ और इंटरैक्टिव फीचर्स दिए जाते हैं, ताकि वे लगातार चुनाव प्रचार से जुड़े रहें।
TMC का डिजिटल कैंपेन अब बड़े पैमाने पर कंटेंट प्रोडक्शन पर आधारित है।
यह पूरा इकोसिस्टम रोज़ाना करीब 50 करोड़ इम्प्रेशन जनरेट करने का दावा करता है।
TMC अपने डिजिटल कैंपेन में ‘बंगाली पहचान’ और ‘स्थानीय गौरव’ को प्रमुख मुद्दा बना रही है। पार्टी का संदेश है कि बाहरी ताकतें बंगाल की संस्कृति और पहचान को प्रभावित करना चाहती हैं, जबकि TMC खुद को ‘बंगाल की असली आवाज़’ के रूप में पेश कर रही है।
TMC अपने शासन के दौरान चलाई गई योजनाओं को भी डिजिटल अभियान में प्रमुखता से दिखा रही है, खासकर ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाएं, जिनके जरिए महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है।
पार्टी इन योजनाओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हुए लगातार प्रचार कर रही है।
जहां BJP का अभियान राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक तरीके से चलाया जा रहा है, वहीं TMC इसे जमीनी स्तर तक ले जाकर लोकल कनेक्शन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
TMC आईटी सेल के अनुसार, पार्टी ने पिछली चुनावी गलतियों से सीख लेते हुए इस बार ज्यादा आक्रामक और संगठित डिजिटल रणनीति बनाई है।
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में डिजिटल प्लेटफॉर्म अब निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
TMC का यह विशाल डिजिटल नेटवर्क और लोकल अप्रोच BJP के लिए कड़ी चुनौती बन सकता है, लेकिन असली फैसला जनता के वोट से ही होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
C. Joseph Vijay ने शुक्रवार को अपने मंत्रिमंडल का एक और विस्तार किया। इस विस्तार के साथ तमिलनाडु सरकार में मंत्रियों की संख्या संविधान द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा तक पहुंच गई है। इस बार Indian Union Muslim League (IUML) और Viduthalai Chiruthaigal Katchi (VCK) के एक-एक विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। ए.एम. शाहजहां और वन्नी अरासु ने ली मंत्री पद की शपथ आईयूएमएल विधायक A. M. Shahjahan और वीसीके विधायक Vanni Arasu ने शुक्रवार को मंत्री पद की शपथ ली। राज्यपाल Rajendra Vishwanath Arlekar ने लोक भवन में आयोजित समारोह में दोनों नेताओं को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। शाहजहां Papanasam विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं, जबकि वन्नी अरासु Tindivanam सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। मंत्रियों की संख्या पहुंची 35 नए विस्तार के बाद मुख्यमंत्री विजय समेत मंत्रियों की कुल संख्या 35 हो गई है, जो राज्य में संवैधानिक सीमा के बराबर मानी जा रही है। इस विस्तार के जरिए विजय सरकार ने अपने सहयोगी दलों को भी सत्ता में प्रतिनिधित्व देने की रणनीति को आगे बढ़ाया है। गुरुवार को भी हुआ था बड़ा विस्तार इससे पहले गुरुवार को मुख्यमंत्री विजय ने अपने मंत्रिमंडल में 23 मंत्रियों को शामिल किया था। इनमें 21 विधायक उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) से थे, जबकि दो मंत्री कांग्रेस कोटे से बनाए गए थे। वहीं, 10 मई को जब विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब उनके साथ नौ विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली थी। कैसे बनी विजय सरकार? तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस बार टीवीके को बड़ी सफलता मिली, लेकिन पार्टी पूर्ण बहुमत से करीब 10 सीट पीछे रह गई। इसके बाद Indian National Congress ने विजय को समर्थन दिया। बाद में कम्युनिस्ट पार्टी, मुस्लिम लीग और वीसीके ने भी सरकार को समर्थन देने का ऐलान किया। अब सहयोगी दलों के नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल कर विजय ने गठबंधन को और मजबूत करने का संकेत दिया है। कम्युनिस्ट पार्टी अब भी बाहर सरकार को समर्थन देने वाली पार्टियों में से अभी तक कम्युनिस्ट पार्टी को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। राजनीतिक हलकों में इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं कि आने वाले समय में कैबिनेट में और बदलाव हो सकते हैं।
VD Satheesan ने सोमवार को केरल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज किया। कांग्रेस नीत United Democratic Front ने 2026 विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल कर दस साल बाद सत्ता में वापसी की है। Rajendra Vishwanath Arlekar ने सतीशन और उनके 20 सदस्यीय मंत्रिमंडल को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद रहे। राहुल गांधी ने गले लगाकर दी बधाई समारोह में Mallikarjun Kharge, Rahul Gandhi, Priyanka Gandhi Vadra और KC Venugopal शामिल हुए। इसके अलावा Siddaramaiah, DK Shivakumar, Revanth Reddy और Sukhvinder Singh Sukhu भी कार्यक्रम में पहुंचे। शपथ लेने के बाद राहुल गांधी ने वीडी सतीशन को गले लगाकर बधाई दी। दोनों नेताओं की बातचीत की तस्वीरें और वीडियो सोशल Media पर भी चर्चा का विषय बने रहे। छात्र राजनीति से मुख्यमंत्री तक का सफर 1964 में कोच्चि के पास नेट्टूर में जन्मे वीडी सतीशन पेशे से वकील हैं। उन्होंने छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की और बाद में यूथ कांग्रेस में सक्रिय भूमिका निभाई। 2021 विधानसभा चुनाव के बाद वे केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने और लेफ्ट सरकार के खिलाफ UDF के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। 2026 विधानसभा चुनाव में उन्होंने परावुर सीट से लगातार छठी बार जीत हासिल की। उन्होंने CPI उम्मीदवार ईटी टायसन मास्टर को 20,600 वोटों से हराया। “24 घंटे में सरकार गठन ऐतिहासिक” शपथ ग्रहण के बाद सतीशन ने कहा कि केरल के इतिहास में पहली बार इतनी तेजी से सरकार गठन की प्रक्रिया पूरी हुई है। उन्होंने बताया कि सहयोगी दलों के साथ चर्चा के बाद 24 घंटे के भीतर मंत्रिमंडल का गठन कर लिया गया। सतीशन ने कहा कि कैबिनेट गठन में क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व, महिलाओं और अनुसूचित जाति समुदाय को विशेष महत्व दिया गया है। 20 सदस्यीय कैबिनेट ने ली शपथ नई सरकार में कांग्रेस और सहयोगी दलों के कई वरिष्ठ नेताओं को जगह दी गई है। मंत्रिमंडल में Ramesh Chennithala, K Muraleedharan और Sunny Joseph जैसे नेताओं को शामिल किया गया है। वहीं Indian Union Muslim League के नेताओं पीके कुन्हालिकुट्टी, पीके बशीर, एन समसुद्दीन और केएम शाजी को भी मंत्रिमंडल में स्थान मिला है। विधानसभा अध्यक्ष और डिप्टी स्पीकर के नाम तय मुख्यमंत्री सतीशन ने घोषणा की कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता Thiruvanchoor Radhakrishnan विधानसभा अध्यक्ष होंगे, जबकि Shanimol Usman को उपाध्यक्ष बनाया जाएगा। सरकार ने विधायक अपू जॉन जोसेफ को मुख्य सचेतक (Chief Whip) नियुक्त किया है। कांग्रेस की 5 गारंटी लागू करने का दावा शपथ ग्रहण से पहले रमेश चेन्निथला ने कहा कि नई सरकार चुनाव के दौरान किए गए सभी प्रमुख वादों को पूरा करेगी। कांग्रेस की प्रमुख गारंटी में शामिल हैं: महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा कॉलेज छात्राओं को हर महीने 1000 रुपये सहायता 3000 रुपये सामाजिक पेंशन हर परिवार को 25 लाख रुपये तक स्वास्थ्य बीमा छोटे कारोबारियों को 5 लाख रुपये तक ब्याज मुक्त ऋण
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद Mamata Banerjee ने पहली बार पार्टी नेताओं और उम्मीदवारों के साथ बड़ी बैठक की। कोलकाता के कालीघाट स्थित आवास पर हुई इस बैठक में उन्होंने साफ कहा कि जो नेता पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। बैठक में तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee भी मौजूद रहे। ममता बनर्जी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं से हार से निराश न होने और संगठन को दोबारा मजबूत करने की अपील की। ‘तृणमूल कांग्रेस कभी नहीं झुकेगी’ ममता बनर्जी ने बैठक में कहा,“जो लोग दूसरी पार्टियों में जाना चाहते हैं, उन्हें जाने दीजिए। मैं पार्टी को नए सिरे से खड़ा करूंगी। जो लोग पार्टी में बने रहेंगे, उनसे कहती हूं कि क्षतिग्रस्त पार्टी कार्यालयों का पुनर्निर्माण कीजिए, उन्हें रंगिए और फिर से खोलिए। जरूरत पड़ी तो मैं खुद भी उन्हें रंग दूंगी।” उन्होंने आगे कहा कि तृणमूल कांग्रेस कभी झुकेगी नहीं और पार्टी फिर से जनता के बीच मजबूती से खड़ी होगी। बंगाल में TMC को मिली बड़ी हार इस बार पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। आजादी के बाद पहली बार Suvendu Adhikari के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में सरकार बनाई। 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस केवल 80 सीटों तक सिमट गई। वहीं ममता बनर्जी को भी अपनी भवानीपुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में भी शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें नंदीग्राम सीट से हराया था। ‘जनादेश लूटा गया’ बैठक में ममता बनर्जी ने चुनाव परिणामों पर भी सवाल उठाए। सूत्रों के अनुसार उन्होंने कहा कि जनता के जनादेश को छीना गया है और पार्टी कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने की कोशिश की गई। अभिषेक बनर्जी ने बढ़ाया उम्मीदवारों का मनोबल तृणमूल कांग्रेस की ओर से जारी बयान में कहा गया कि पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया। पार्टी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “हमारे उम्मीदवारों ने लगातार धमकियों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद साहस के साथ चुनाव लड़ा।” TMC के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती राज्य की सत्ता गंवाने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठन को बचाए रखना और नेताओं के संभावित पलायन को रोकना सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में पार्टी के भीतर बड़े बदलाव और संगठनात्मक फेरबदल देखने को मिल सकते हैं।